गौरी लंकेश,’वे मुझे वेश्या भी कहेंगे तो फ़र्क़ नहीं पड़ेगा’!!!

Bengaluru: Citizens with posters and placards during a protest against the killing of journalist Gauri Lankesh, who was shot dead by motorcycle-borne assailants outside her residence last night, during a protest in Bengaluru on Wednesday. PTI Photo by Shailendra Bhojak (PTI9_6_2017_000034A)

”आज हम किससे लड़ने जा रहे हैं?” गौरी लंकेश की पत्रकार दोस्त जब सुबह उन्हें फ़ोन करती थीं तो अक्सर यही सवाल पूछती थीं!

”आपकी शिकायत किससे है?”

लंकेश अक्सर अपने संपादक से पूछती थीं कि उनके अख़बार ने उन मुद्दों को लेकर मजबूत रुख क्यों नहीं अपनाया जो उनके दिल के क़रीब है. ”अगर आप प्रभावी लोग ठोस क़दम नहीं उठा सकते तो हम इसे कैसे करेंगे?” गौरी लंकेश एक निर्भीक आवाज़ थीं जिसे ख़ामोश कर दिया गया!

दक्षिण भारत के जिस शहर बंगलुरू में वह रहती थीं वहीं से वो अपने नाम से ही एक साप्ताहिक टेब्लॉयड निकालती थीं. यह टेब्लॉयड कन्नड़ भाषा में निकलता है जो उन्हें पिता से विरासत में मिला था

इसे वह पाठकों के चंदे से चलाती थीं. यह कर्नाटक की संस्कृति पर आधारित एक एक्टिविस्ट टेब्लॉयड है जिसमें विज्ञापन नहीं छपता है

लंकेश की पहचान एक मजबूत वामपंथी विचारक के रूप में थी. उनका विचार संपादकीय में भी साफ़ दिखता था. लंकेश दक्षिणपंथी हिन्दुवादी विचारधारा पर जमकर बरसती थीं. उनका मानना था कि धार्मिक और बहुसंख्यकवाद की राजनीति भारत को तोड़ देगी!

हिंदूवादी राजनीति के ख़िलाफ़

जब जाने-माने विचारक विद्वान मलेशप्पा कलबुर्गी की बेंगलुरु में उनके घर पर गोली मारकर हत्या की गई तब से ही उन्हें भी दक्षिणपंथी हिन्दू समूहों से धमकी मिल रही थी!

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लंकेश ने अपने एक दोस्त से कहा था, ”मुझे इनसे डर नहीं लगता है. अगर मुझे वे वेश्या भी कहते हैं तब भी मुझे फ़र्क़ नहीं पड़ता है. लेकिन मैं देश को लेकर चिंतित रहती हूं. ये लोग इस देश को तोड़ देंगे”

एक और वजह से लंकेश निशाने पर रहती थीं. वो माओवादी विद्रोहियों से खुली सहानुभूति रखती थीं. माओवादी भारत सरकार से लंबे समय से लड़ाई लड़ रहे हैं. दूसरी तरफ़ लंकेश माओवादियों को मुख्यधारा में लाने में लगी थीं. इसके साथ ही उन्होंने दलितों को अधिकार दिलाने के लिए भी अभियान चलाया जिन्हें अछूत समझा जाता है!

लंकेश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी हिन्दू राष्ट्रवादी पार्टी बीजेपी को बिल्कुल पसंद नहीं करती थीं. वो अपने फ़ेसबुक पोस्ट में अक्सर प्रधानमंत्री मोदी का नाम लेती थीं. हाल ही की फ़ेसबुक पोस्ट में लंकेश ने पीएम मोदी की आलोचना की थी. वो हमेशा भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि को लेकर मुखर रहती थीं!

लंकेश का अख़बार अपनी विषय-वस्तु को लेकर हमेशा चर्चा में रहता था. कई बार तो लंकेश की स्टोरी से उनके ही दोस्तों को असुविधाजनक स्थिति का सामना करना पड़ा. लंकेश ने कभी अपनी प्रतिबद्धता से समझौता नहीं किया. वह अपने ट्विटर अकांउंट पर ख़ुद को ‘जर्नलिस्ट-एक्टिविस्ट’ बताती थीं!

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इसमें कोई हैरान करने वाली बात नहीं है कि उनके अख़बार पर मानहानि के मुक़दमों का अंबार था. पिछले साल एक मानहानि के मामले में उन्हें दोषी करार दिया गया था. उन्होंने स्थानीय बीजेपी नेताओं के ख़िलाफ़ एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी. तब कोर्ट के फ़ैसले पर बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख ने एक ट्वीट किया था, ”अब दूसरे पत्रकार कोर्ट के फ़ैसले का ख़्याल रखेंगे”

पिता की विरासत

हालांकि इन सबका असर लंकेश पर नहीं पड़ा. लंकेश पत्रिका के प्रसार और राजस्व में लगातार गिरावट के बावजूद उसकी धार बनी रही. उसने टकराना बंद नहीं किया. गौरी लंकेश को पत्रकारीय साहस उनके पिता पी लंकेश से विरासत में मिला था. वह कर्नाटक में एक सांस्कृतिक हस्ती के रूप में जाने जाते थे

पी लंकेश एक जीवंत और भारी प्रसार वाला टेब्लॉयड निकालते थे. उन्होंने कई ऐसे उपन्यास भी लिखे हैं जिन्हें पुरस्कार मिले. इसके साथ ही लंकेश ने फ़िल्में भी बनाईं. इतनी सारी ख़ूबियों के कारण उनका व्यक्तित्व सीमाओं से परे था. इसके साथ ही वो एक निडर एक्टिविस्ट थेगौरी लंकेश

गौरी लंकेश अपने मां-बाप की तीन संतानों में सबसे बड़ी थीं. उन्होंने शुरू में ही पत्रकारिता में जाने का फ़ैसला कर लिया था. उन्होंने दिल्ली से पत्रकारिता की पढ़ाई की थी. लंकेश ने एक अग्रणी अख़बार के साथ काम किया था. जब 2000 में गौरी लंकेश के पिता का निधन हुआ तो वो 20 साल पुराना अख़बार चलाने को लेकर अनिच्छुक थीं. हालांकि जब उन्होंने अख़बार को संभाला तो पूरी तरह से राजनीतिक हो गईं और उन्होंने उग्र राजनीतिक रुख़ अपनाया

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दोस्तों के बीच गौरी लंकेश की पहचान एक जुझारू और लोगों से गर्मजोशी से मिलने वाले व्यक्ति के रूप में थी. लंकेश के साथ दो छात्र नेता रहते थे. इनमें से एक दलित समुदाय से हैं और दूसरे के ख़िलाफ़ देशद्रोह का आरोप लगा है. ये अक्सर इनके घर आमंत्रित होते थे. जब गौरी लंकेश इन्हें टी-शर्ट गिफ्ट करना चाहती थीं तो वो अपने एक पुरुष मित्र को फ़ोन करती थीं और पूछती थीं- तुम क्या सोचते हो, वे कौन सा रंग पसंद करेंगे?”Image result for gauri lankesh in hindi

हाल के महीनों में लंकेश ने प्रेस की स्वतंत्रता पर बढ़ते हमले पर लिखा था. इसके साथ ही उन्होंने स्थानीय राजनीति और बेंगलुरु में महिलाओं की असुरक्षा को लेकर भी लिखा था

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